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आदर्श आचार संहिता

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चुनावों की घोषणा के साथ ही आदर्श आचार संहिता लागू हो चुकी है. वर्तमान आचार संहिता के प्रारूप राजनैतिक दलों को पूर्णतः आदर्श आचरण के लिये बाध्य नहीं कर पाते.

मुझे लगता है कि आचार संहिता में कुछ और कठोरता की अवश्यकता है. नियम सिर्फ तोड़ने के लिये ही बनाये जाते हैं, ऐसा स्वयं को देश के कानून से उपर समझने वाले लगभग सभी राजनैतिक दल ना सिर्फ मानते हैं, बल्कि अपनी हर घोषणा से साबित भी करते हैं. इस लेख के माध्यम से कुछ सुझाव रखना चाहता हूँ इस आशा के साथ कि कोई तो जागरुकता के साथ इस दिशा में भी आवाज उठायेगा.

1. चुनावों के ठीक पहले राजनैतिक दल मुफ्त बिजली, पुराने बिजली के बिल और कृषि कार्यों के हेतु लिये कर्जे माफी की घोषणा कर देते हैं. अक्सर ये वादे उनकी सरकार बनने पर लागू करने के वादे होते हैं. इस पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिये. यदि कोई वादा करे भी तो चुनाव आयोग को यह निर्धारित करना चाहिये कि किसी भी मुफ्त की घोषणा का भुगतान उस राजनैतिक दल के पार्टी फंड से किया जाना चाहिये. राजनैतिक फायदे के लिये किये वायदों का बोझ आम जनता क्यूं उठाये ? वैसे भी राजनैतिक दल जनसेवा के लिये गठित होते हैं, उनका फंड भी उनके समर्थकों का दिया पैसा ही होता है. ऐसे में इस फंड का उपयोग अपनी लुभावनी घोषणाओं को पूरा करने की बाध्यता भी होनी चाहिये.

2. आचार संहिता लागू किये जाने के बाद किसी भी प्रत्याशी या उसके समर्थन के लिये आयोजित सभाओं में किसी भी जाति / धर्म / सम्प्रदाय का उल्लेख करना पूर्णतः प्रतिबंधित होना चाहिये. यह सुनिश्चित होना चाहिये कि प्रत्याशी पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करे, ना कि किसी जाति / धर्म / सम्प्रदाय विशेष का.

3. किसी भी जाति / जनजाति / धर्म / सम्प्रदाय के पक्ष में फ़तवा / समर्थन की अपील करने वाले प्रत्याशियों के समर्थकों पर जनसमूह को बरगलाने की कोशिश का अपराधिक मुकदमा चलाया जाना चाहिये.

4. पिछले बार चुने गये सांसद / विधायक की संसद / विधानसभा में उसकी निष्क्रियता उस उम्मीदवार के प्रत्याशी बनाये जाने का पैमाना होना चाहिये. यदि ऐसा प्रत्याशी पिछले कार्यकाल में सीमा से अधिक अनुपस्थित या असक्रिय रहा हो, तो उस व्यक्ति को फिर चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया जाना चाहिये. ऐसा ही पैमाना उसकी सांसद / विधायक निधि में आवंटित राशि के अनुपयोग की दशा में अपनाया जाना चाहिये.

शायद कुछ बदलाव आये ऐसे ही.

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